‘संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण’ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दिया नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने महिला आरक्षण विधेयक को संसद के दोनों सदनों में दोबारा पेश करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह एक अहम मामला हैI इसके बाद याचिका के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा हैI यह तब हुआ जब नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमेन की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही थीI याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण पेश हुए।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया हैI न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि यह मामला महत्वपूर्ण है। यह याचिका नेशनल फेडरेशन ऑफ विमेन ने दायर की है। याचिकाकर्ता ने कहा कि महिलाओं के आरक्षण के लिए 25 साल पहले 2008 में महिला आरक्षण विधेयक लाया गया थाI

यह भी तर्क दिया गया कि इसे राज्यसभा में पारित किया गया था, लेकिन इसे लोकसभा में नहीं रखा जा सका क्योंकि इसका कार्यकाल समाप्त हो गया था। वास्तव में याचिका में यह भी कहा गया है कि विधेयक 2010 में राज्यसभा द्वारा पारित किया गया था लेकिन लोकसभा के विघटन के बाद इसे समाप्त कर दिया गया था, इसे लोकसभा के समक्ष नहीं रखा गया था, भले ही इसे राज्यसभा द्वारा पारित किया गया था।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि बिल का पेश न होना मनमाना है। आगे कहा गया कि इससे भेदभाव हो रहा है। यह विधेयक अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 2010 में राज्यसभा द्वारा पारित किया गया था। यह निवेदन किया जाता है कि ऐसा महत्वपूर्ण और लाभकारी विधेयक पेश न करना मनमाना है जिस पर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की एक आभासी सहमति है।

हाल ही में 20 प्रतिशत विधेयक संसद के मानसून सत्र 2021 में पारित हुए। आजादी के 75वें वर्ष में भी महिलाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है, हालांकि उनकी संख्या 50 प्रतिशत है, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व 14 प्रतिशत है। इस बिल को बीजेपी, कांग्रेस, डीएमके, एसपी, अकाली दल, सीपीएम, एनसीपी और एआईडीएमके ने समर्थन दिया था।